महफ़िल में क्या होता है, ये हम कैसे तुम्हें बतायें,
ढ़ेर-ढ़ेर और लम्बी बातें अनथक, अपलक बोले जायें।
चार लोग जब साथ मिलें तब मस्ती में कुछ बोलें गायें,
जाने कब-कब; कैसे-कैसे महफ़िल जाने कहाँ बनायें।
उलझी गुत्थी को सुलझायें, राज़ दिलों के बोलें जायें,
बंद किताबों के हर पन्ने एक-एक कर खोलें जायें।
कभी अरस्तू; कभी कबीरा, कभी हीर; ग़ालिब कभी आयें,
महफ़िल की वो बात-बतक्कड़ स्मृति से जाने न पाये।
आओ बैठो साथ मिलो कभी महफ़िल अपनी कहीं बनायें
न जाने कब लौट के आयें महफ़िल के ये गीत-कथायें।
- अच्युत शुक्ल