Tuesday, May 31, 2016

बादल को घिरते देखा है

आज प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन की बेहद सहज, सरल और सुन्दर एवं सुर, लय, ताल, छंद से युक्त कविता "बादल को घिरते देखा है"

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,

बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान् सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।

शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
दुर्गम बर्फानी घाटी में
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल-तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,

बादल को घिरते देखा है।

कहाँ गय धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु कनन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों की कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपटी पर,
नरम निदाग बाल कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है।

बादल को घिरते देखा है।

Monday, May 30, 2016

उदघोषणा

छोटे सपने, बड़े इरादे
क्या मंजिल पा पायेंगे ?
पथ के कंटक
प्रतिपल, प्रतिक्षण
अपना जाल बिछायेंगे ।
मार्ग कठिन है
दुर्गम, दुर्लभ
अवरोध भी हैं बड़े-बड़े,
जैसे राह में हों
विशाल, भीमकाय पर्वत खड़े
हवा का रुख भी बदला हो
और धारा भी अनुकूल न हो,
समय समय पर
समय भी माकूल न हो,
माना सिक्के खोटे हैं,
पर नहीं इरादे छोटे हैं
क्या हुआ जो दुर्गम मार्ग है !
क्या हुआ जो रुख भी बदला है !
क्या हुआ जो धारा है प्रतिकूल !
क्या हुआ जो समय भी न अनुकूल !
मजबूती से चलने वाले,
नहीं हैं हम रुकने वाले,
अब एक ही उदघोष् हम करते चले,
आगे बढ़े , आगे बढ़े
बढ़ते चले...
छोटे सपने , बड़े इरादे
हाँ मंजिल पा पाएँगे.....

- अच्युत

Sunday, May 29, 2016

हैदराबाद के जीत के मायने

यूँ तो हर टीम के अपने समर्थक होते है, अपने फैंस का कुनबा होता है पर कहीं कुछ बहुत ज़्यादा होते हैं तो कहीं बहुत कम। इस बार यूँ तो हर टीम कप के दावेदार थी पर मैं हैदराबाद की वकालत कर रहा हूँ उसके पीछे कुछ तथ्यों को देखिये.. -

1. हैदराबाद हर सीजन में सबसे फ़िसड्डी टीम्स में से एक रह चुकी है।

2. वार्नर के अलावा हैदराबाद में कोई नामी खिलाड़ी नहीं हैं।

3. जितने भी भारतीय खिलाड़ी इस टीम में हैं उनमे से कई आउट ऑफ़ फॉर्म हैं।

4. और तो और हैदराबाद ने उस टीम को हराने में सफलता प्राप्त की , जिसमे पूरे टूर्नामेंट के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज थे।

अब तो आप कह सकते हैं न की इस टूर्नामेंट की सबसे प्रबल दावेदार यही एक है जो कई विदेशी नामी खिलाडियों के न होते हुए भी टूर्नामेंट जीते।

जश्न मनाओ हैदराबाद वालों......

गहराता जल संकट

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....... पानी के रंग का तो तब पता चलेगा न जब पानी मिलेगा। जब पानी मिलेगा ही नहीं तो क्या रंग, क्या स्वाद। उत्तर भारतीय क्षेत्रों को भी इस साल पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है। जहाँ जून, जुलाई के मौसम में बहुतायत मात्रा में वर्षा होती थी। भीषण गर्मी की वजह से नदी, तालाब, पोखरों का सूखना अब आम बात हो गयी है। वर्षा जल का सरंक्षण होता नहीं है, इसीलिए जो थोडा बहुत पानी बरसता भी है वो या तो नालियों में बह जाता है या गर्मी के कारण वाष्पीकृत हो जाता है। शहरों में लगे हुए हैंडपम्पो से भी पानी नहीं मिलता है। आज से 3 4 साल पहले जो पानी बीस से पच्चीस फुट गहराई पे था, वो अब लगभग पैतीस फुट तक पहुँच चुका है। तो इसका उपाय भी निकाला गया, उपाय मिला 'समर्सिबल' जो लगभग साठ से पैंसठ फुट गहराई से पानी खींचता है। हालिया स्थिति ये है की शहर के हर घर में समर्सिबल लगवाने का कार्यक्रम पुरे जोर शोर से हो रहा है। यहाँ देखने योग्य बात ये है की आज से लगभग तीस साल पहले गाँव में जो कुँए होते थे उसमे पानी दस से पंद्रह फुट मिल जाता था वही आज तीस से पैंतीस तक चला गया है। यदि यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब साठ फुट पे भी पानी बमुश्किल मिलेगा।

असल में इस स्थिति को लाने के ज़िम्मेदार हम सब हैं। बेतहाशा पानी की बर्बादी इसका प्रमुख कारण है। अपने दैनिनंद कार्य करते हुए अक्सर हम नल को खुला छोड़ देते हैं। टंकी भर जाने पर भी बहा करती है। तो भइया जैसा बोओगे वैसा काटोगे। बोये पेड़ बबूल के तो नीम कहाँ से होये..... जहाँ एक मग पानी से काम चल रहा है वहां एक बाल्टी इस्तेमाल करना छोड़िये। जब तक चल रहा है चलने दो- ये सोच भी छोड़नी पड़ेगी। वरना अपनी आगे आने वाली पीढ़ी की पानी समस्या के दोषी हम सब होंगे। और वह दिन दूर नहीं जब तृतीय विश्व युद्ध सचमुच में पानी की वज़ह से ही होकर रहेगा। पानी पेट्रोल से भी महँगा हो जायेगा।

भइया जल है तो जीवन है यूँ ही नहीं कहा गया ...... लेशमात्र सच्चाई तो कम से कम देखिये।

न करिये जल की बर्बादी,
कि, मिट जायेगी ये आबादी।

पैबन्द

बड़े सहेजकर रखे थे रिश्ते मैंने जो ,
अहमियत की चाशनी में पले थे जो ,
वक़्त की आँधी में तनते चले गए ,
बात बेबात पर बिगड़ते चले गए ।
जैसे तनी हुई रस्सी ,
पर ;
मारता है कोई टंकार,
और झनझना जाती है रस्सी ।
तने हुए रिश्तों पर भी ,
पड़ती है मार ;
गलतफहमियों की ।
जैसे बरसों से चल रहा कोई कपड़ा ,
घिस गया हो ,
तो उस पर पैबन्द लगा दिए जाते हैं.....
ऐसा न जाने कितने 'पैबन्द' लगाये,
मैंने ,
टूटे हुए रिश्तों पर ;
पर क्या होगा अगर ,
कपडे ही चलन से बाहर हो जाएँ ?
जैसे कई रिश्ते असमंजस में पले ?
तब पैबन्द किस काम के ?
माना रिश्ते 'रफू' नहीं होते,
पर सीवन उधड़ने पर ,
सीना ज़रूरी हो जाता है ........

  - अच्युत

शुभ रात्रि

रात के हमसफ़र थक के घर को चले, झूमती आ रही है सुबह प्यार की।

..... रात के हमसफ़र थकते तो ज़रूर हैं पर सुबह किसी की प्यार भरी नहीं होती इस दुनिया। बेबाक दौड़, मानव का मशीनीकरण, दिन रात काम में मग्न इंसान को फुरसत ही नहीं है ये जानने की, कि क्या वाकई सुबह प्यार भरी हो सकती है। दिनकर जी ने लिखा है -

रात यूँ कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है,
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता,
और फिर दिन रात न जगता न सोता है।

दिनभर बस चिंतामग्न हो गया है अपना समाज। हर किसी को कोई न कोई चिंता सता रही है। एक रेस चल रही है हम सबके बीच। इस रेस में हम कितना आगे निकल आये, क्या छोड़ आये, क्या पाया..? ये तो जीवन के अंतिम दिनों में ही पता चल सकेगा। ख़ैर, तब तक के लिए शुभ रात्रि। ..