Thursday, November 19, 2020

 जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जिनमे लगने लगता है कि अब सब आशायें खत्म, कुछ नहीं बचा, कुछ समझ नहीं आ रहा कि एक नयी शुरुआत की जाए या न कि जाए और कि जाए तो कहाँ से की जाए उसका औचित्य क्या होगा । 


ऐसी उहापोह और पशोपेश की स्तिथियाँ जब घेरने लगती है तो मन उम्मीदों के द्वार को ढूँढता है । जो भी लोग ऐसी किसी परिस्थितियों में खुद को घिरा पाएं उनको महाकवि निराला द्वारा रचित राम की शक्ति पूजा नामक लंबी कविता को एक बार एकांत में सम्पूर्ण तन्मयता के साथ अवश्य पढ़ना चाहिये ।


आप खुद को उसी दर्पण में देखने लग पाने में सक्षम होंगे जिसमे निराला ने स्वयं को देखा था। वो दिन खुद निराला के जीवन के सबसे निराशावादी क्षण थे । पत्नि विछोह और तत्पश्चात अपनी पुत्री सरोज के अकस्मात देहावसान से उस समय निराला अपने जीवन के सबसे अंधकार पूर्ण क्षणों में से गुज़र रहे थे। उनके राम अलौकिक नहीं हैं , वे मानव रूप में हैं और अगर हम अपनी दृष्टि का दायरा बढ़ायें तो निराला के राम निराला स्वयं हैं -


धिक जीवन ! जो पाता ही आया सदा विरोध

धिक साधन जिसके लिये किया सदा ही शोध


कभी कभी मैं भी जब स्वयं को ऐसे उहापोह में बंधा पाता हूँ तो निराला के राम को याद करता हूँ जो अनजाने में ही मुझमें एक नई ऊर्जा का संचार करता है -


वह एक और मन रहा राम का जो न थका ।


और जैसा कहा जाता है कि सारे उम्मीदों के द्वार बंद हो जाने पर एक द्वार अवश्य खुला रहता है , उसके ताले की चाभी हमारे पास ही होती है जरूरत बस उसे पहचानने की है , और उसके बाद विजय निश्चित है -


होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन

कह महाशक्ति राम के बदन में हुई लीन ।

लोग कितनी आपा धापी में जी रहे हैं । कभी भीड़ भाड़ में चलते चलते यकायक एक कोने में खड़े होकर रुकिए, और देखिए कितनी पशोपेश में लोग हैं , कितनी बेचैनी है माथे पे शिकन हैं पर इंसान भी क्या करे ख्वाइशों का गुलाम है 

पहले साईकल पर चलना भी अच्छा लगता था, मजे में लेकर निकल जाते थे तब यही लगता था कि पिताजी आ रहें होंगे बाहर से उनसे कहेंगे कि साईकल घर के अंदर हम करेंगे वो चबूतरे से साईकल अंदर करने पर भी क्या अद्भुत अनुभूति होती थी ऐसा लगता था मानो कई कई इच्छायें एक साथ पूरी हो गयी हो, आज साईकल है तो मोटर साईकल चाहिए ; मोटर साईकल है तो मन करता है एक चार पहिया हो। चार पहिया भी अगर कहीं से लोन वोन करके ले ली जाए तो उसमें चलने पर भी वो साईकल को चबूतरे से अंदर करने वाला एहसास नहीं आता। 

जी करता है फिर से पुरानी चीजों में लौट जाया जाए, पर अब वो सब मुमकिन कहाँ । कभी कभी बस यूं ही रुककर बैठकर एकांत में वो एहसास दुबारा जीने की कोशिश रहती है ।