Thursday, November 19, 2020

लोग कितनी आपा धापी में जी रहे हैं । कभी भीड़ भाड़ में चलते चलते यकायक एक कोने में खड़े होकर रुकिए, और देखिए कितनी पशोपेश में लोग हैं , कितनी बेचैनी है माथे पे शिकन हैं पर इंसान भी क्या करे ख्वाइशों का गुलाम है 

पहले साईकल पर चलना भी अच्छा लगता था, मजे में लेकर निकल जाते थे तब यही लगता था कि पिताजी आ रहें होंगे बाहर से उनसे कहेंगे कि साईकल घर के अंदर हम करेंगे वो चबूतरे से साईकल अंदर करने पर भी क्या अद्भुत अनुभूति होती थी ऐसा लगता था मानो कई कई इच्छायें एक साथ पूरी हो गयी हो, आज साईकल है तो मोटर साईकल चाहिए ; मोटर साईकल है तो मन करता है एक चार पहिया हो। चार पहिया भी अगर कहीं से लोन वोन करके ले ली जाए तो उसमें चलने पर भी वो साईकल को चबूतरे से अंदर करने वाला एहसास नहीं आता। 

जी करता है फिर से पुरानी चीजों में लौट जाया जाए, पर अब वो सब मुमकिन कहाँ । कभी कभी बस यूं ही रुककर बैठकर एकांत में वो एहसास दुबारा जीने की कोशिश रहती है ।

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