नव दिनकर का नया सवेरा तुझको राह दिखायेगा,
एक कदम तो बढ़ा रे साथी जग भी साथ में आएगा।
गर तू निद्रामग्न रहा तो पिछड़ बहुत तू जायेगा,
स्वप्नलोक के भंवरजाल में फंसकर तू रह जायेगा।
कितना चलना तुझे है बाकी कितना पाना बाकी है,
अन्धकारमय इस जीवन में उजियाला लाना बाकी है
हासिल कर अपने मुकाम तू खुद अपने दम पर,
आश्रय की पतवार को छोड़ लहरों में अब तू उतर।
तेरी मेहनत कभी तो तुझको रंग नया दिखलाएगी
इस बंजर धरती में भी कभी उपवन नया खिलायेगी।
मोती मोती माला होती बूँद बूँद भरता है घड़ा
वैसे थोडा थोडा करके मंजिल पे तू आ हो खड़ा।
परवाह न कल की तू कर वर्तमान में आगे बढ़,
जो बीत गया सो बीत गया अब कोई नयी कहानी गढ़।
- अच्युत
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