Friday, September 9, 2016

पर्चे पर हिन्दुस्तान

संध्याकाल के समय जब आसमान धीरे धीरे लालिमा को ग्रहण करता है, जब हवा की सरसराहट को महसूस किया जा सकता है, जब लोग-बाग़ थके-मांदे घर की ओर रुख करते हैं , मैं अक्सर सडकों पे घूमने निकल पड़ता हूँ। कहीं कहीं लोग शाम की चाय की चुस्की में डूबे हुए दिन भर की थकान बांटते और आपस में बातें साझा कर रहे होते है। वहीँ कहीं एक छोटे से मैदान में कुछ बच्चे उछलते कूदते नज़र आते हैं। इधर जब से शहर से पार्कों का विलुप्तिकरण हो चला है बच्चे अक्सर सड़को और दुकानों के बीच बने छोटे- चौड़े फुटपाथों पर खेलते नज़र आतें हैं। आकाश में पक्षियों का एक पूरा समूह आपने आशियाने को लौटा जा रहा है। कभी कभार एक दो पतंगे भी नज़र आती हैं। पर शायद अब शहर से 'काइट मेकर' चला गया है। ज़माना बीत गया पतंगों भरे आसमान को देखे हुए। नीले नीले आसमान में रंग बिरंगी पतंगे ऐसी लगती थी मानो किसी चित्रकार में कैनवास पर अपनी कल्पना की सर्वोत्तम कृति उकेरी हो।

                                 कुछ पुराने ढंग की दुकानों के आगे प्रायः अभी भी मिट्टी की कुछ चबूतरें मिल जाया करती हैं या किसी बगीचे के चारों और फैली हुई मिट्टी, जो पानी छिड़कने पर एक अलग सी सौंधी से खुशबू बिखेरती है। ये शहर कभी सोता नहीं है। जो लोग सुबह सवेरे काम पे निकलते हैं, वे शाम होते होते घर आ जाते हैं तब इधर 'नाईट-शिफ्ट' वालों का काम चालू होता है। सड़क के दूसरी ओर देखता हूँ , कच्ची उमर के कुछ बच्चे कंधे पर बस्ता डाले मस्ती में झूमते हुए चले जा रहे हैं। ये अपने जीवन के सबसे यादगार पल बना रहे हैं।

                                    पर तभी मेरी नज़र चौराहे पर खड़े उस छोटे से बच्चे पर जाती है। जो हाथों में पर्चों का बण्डल लिए, आते जाते राहगीरों को उनके मना करने पर भी एक एक पर्चा थमाए जा रहा है। उसकी आँखों में अनगिनत सपने है। ये हिन्दुस्तान है। मेरा अपना हिन्दुस्तान। जो दुनिया में सर्वाधिक युवा शक्ति संपन्न देश है। पर कभी चौराहे पर खड़े उस बच्चे की आँखों में झांककर देखिये। ये हिन्दुस्तान का प्रतिबिम्ब हैं। क्या कहती हैं ये आँखे ? क्या आपमें साहस है इनसे नज़रे मिलाने का ? शायद नहीं। यथार्थ का सामना होते ही मिथ्या दुबक जाती है। जब हम सुबह सवेरे अपने अपने घरों में औंधे मुँह होते हैं तब वो सायकिल के कैरियर पर अख़बारों का बण्डल लिए सबके घर घर में हिन्दुस्तान को पहुँचाता है। जब हम अपने अपने दफ्तरों में बैठे अपने कार्यों में मशगूल होते है तब भी शायद वो तपती धूप में खड़े होकर पर्चे बाँट रहा होता है। हिन्दुस्तान तपती धूप में पसीने से लथपथ। मेरा शहर सच में सोता नहीं है। ये हिन्दुस्तान का भविष्य है जो कभी सोने ही नहीं पाता। चिन्ताभार से ग्रसित, दो जून की रोटी का तलबगार। मुफलिसी में जीता हिन्दुस्तान। पर पर्चे पे क्या लिखा है शायद वो इन सब बातों से अनभिज्ञ है। उसे तो बस अपने 'मंथली टारगेट' से मतलब।

                               मैंने कहीं पढ़ा था की बच्चे गीली माटी जैसे होते हैं। अबोध। उनको जैसा ढालोगे वैसा ही ढल जायेंगे। पर आज जब मैं देखता हूँ तो पाता हूँ की कुम्हार नदारद है। ये हमारा, हम सबका दायित्व है कि मिट्टी को कैसा ढालें, समाज की दिशा-दशा को किस ओर मोड़ें। जैसा हम बोयेंगे, वैसा ही काटेंगे। हम ज़रिया बने। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब आधा हिन्दुस्तान पर्चे पर ही सिमट कर रह जायेगा। आज जब बड़ी बड़ी सरकारें शीत नियंत्रित कक्ष में बैठी हुई हिन्दुस्तान के भविष्य की योजना बनाती है तब हिन्दुस्तान , हिन्दुस्तान के विकास के लिए पर्चे बाँट रहा होता है।

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