मेरे इश्क़ का मसला ये तमाम हुआ,
मैं हुआ, बदनाम सरेआम हुआ।
मुद्दतों बाद कोई नज़र आया,
मैं हुआ, गुल-ए-गुलफाम हुआ।
उन्होंने बाज़ार में मेरी कीमत जो पूछी,
मैं हुआ, भरे बाज़ार शर्मशार हुआ।
तोड़ा दिल उन्होंने काँच से कुरेद के,
बेवफ़ा मैं ही साबित उस बार हुआ।
रश्म-ए-उल्फ़त को निभाया मैंने,
गलीज़ ज़ुम्बिशों का शिकार हर बार हुआ।
* गलीज़ - असभ्य, गन्दा
* ज़ुम्बिश - हरकत, गति
- अच्युत शुक्ल
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