Sunday, May 29, 2016

गहराता जल संकट

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....... पानी के रंग का तो तब पता चलेगा न जब पानी मिलेगा। जब पानी मिलेगा ही नहीं तो क्या रंग, क्या स्वाद। उत्तर भारतीय क्षेत्रों को भी इस साल पानी की समस्या से जूझना पड़ रहा है। जहाँ जून, जुलाई के मौसम में बहुतायत मात्रा में वर्षा होती थी। भीषण गर्मी की वजह से नदी, तालाब, पोखरों का सूखना अब आम बात हो गयी है। वर्षा जल का सरंक्षण होता नहीं है, इसीलिए जो थोडा बहुत पानी बरसता भी है वो या तो नालियों में बह जाता है या गर्मी के कारण वाष्पीकृत हो जाता है। शहरों में लगे हुए हैंडपम्पो से भी पानी नहीं मिलता है। आज से 3 4 साल पहले जो पानी बीस से पच्चीस फुट गहराई पे था, वो अब लगभग पैतीस फुट तक पहुँच चुका है। तो इसका उपाय भी निकाला गया, उपाय मिला 'समर्सिबल' जो लगभग साठ से पैंसठ फुट गहराई से पानी खींचता है। हालिया स्थिति ये है की शहर के हर घर में समर्सिबल लगवाने का कार्यक्रम पुरे जोर शोर से हो रहा है। यहाँ देखने योग्य बात ये है की आज से लगभग तीस साल पहले गाँव में जो कुँए होते थे उसमे पानी दस से पंद्रह फुट मिल जाता था वही आज तीस से पैंतीस तक चला गया है। यदि यही स्थिति रही तो वो दिन दूर नहीं जब साठ फुट पे भी पानी बमुश्किल मिलेगा।

असल में इस स्थिति को लाने के ज़िम्मेदार हम सब हैं। बेतहाशा पानी की बर्बादी इसका प्रमुख कारण है। अपने दैनिनंद कार्य करते हुए अक्सर हम नल को खुला छोड़ देते हैं। टंकी भर जाने पर भी बहा करती है। तो भइया जैसा बोओगे वैसा काटोगे। बोये पेड़ बबूल के तो नीम कहाँ से होये..... जहाँ एक मग पानी से काम चल रहा है वहां एक बाल्टी इस्तेमाल करना छोड़िये। जब तक चल रहा है चलने दो- ये सोच भी छोड़नी पड़ेगी। वरना अपनी आगे आने वाली पीढ़ी की पानी समस्या के दोषी हम सब होंगे। और वह दिन दूर नहीं जब तृतीय विश्व युद्ध सचमुच में पानी की वज़ह से ही होकर रहेगा। पानी पेट्रोल से भी महँगा हो जायेगा।

भइया जल है तो जीवन है यूँ ही नहीं कहा गया ...... लेशमात्र सच्चाई तो कम से कम देखिये।

न करिये जल की बर्बादी,
कि, मिट जायेगी ये आबादी।

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