Sunday, May 29, 2016

पैबन्द

बड़े सहेजकर रखे थे रिश्ते मैंने जो ,
अहमियत की चाशनी में पले थे जो ,
वक़्त की आँधी में तनते चले गए ,
बात बेबात पर बिगड़ते चले गए ।
जैसे तनी हुई रस्सी ,
पर ;
मारता है कोई टंकार,
और झनझना जाती है रस्सी ।
तने हुए रिश्तों पर भी ,
पड़ती है मार ;
गलतफहमियों की ।
जैसे बरसों से चल रहा कोई कपड़ा ,
घिस गया हो ,
तो उस पर पैबन्द लगा दिए जाते हैं.....
ऐसा न जाने कितने 'पैबन्द' लगाये,
मैंने ,
टूटे हुए रिश्तों पर ;
पर क्या होगा अगर ,
कपडे ही चलन से बाहर हो जाएँ ?
जैसे कई रिश्ते असमंजस में पले ?
तब पैबन्द किस काम के ?
माना रिश्ते 'रफू' नहीं होते,
पर सीवन उधड़ने पर ,
सीना ज़रूरी हो जाता है ........

  - अच्युत

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