रात के हमसफ़र थक के घर को चले, झूमती आ रही है सुबह प्यार की।
..... रात के हमसफ़र थकते तो ज़रूर हैं पर सुबह किसी की प्यार भरी नहीं होती इस दुनिया। बेबाक दौड़, मानव का मशीनीकरण, दिन रात काम में मग्न इंसान को फुरसत ही नहीं है ये जानने की, कि क्या वाकई सुबह प्यार भरी हो सकती है। दिनकर जी ने लिखा है -
रात यूँ कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है,
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता,
और फिर दिन रात न जगता न सोता है।
दिनभर बस चिंतामग्न हो गया है अपना समाज। हर किसी को कोई न कोई चिंता सता रही है। एक रेस चल रही है हम सबके बीच। इस रेस में हम कितना आगे निकल आये, क्या छोड़ आये, क्या पाया..? ये तो जीवन के अंतिम दिनों में ही पता चल सकेगा। ख़ैर, तब तक के लिए शुभ रात्रि। ..
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