Monday, May 30, 2016

उदघोषणा

छोटे सपने, बड़े इरादे
क्या मंजिल पा पायेंगे ?
पथ के कंटक
प्रतिपल, प्रतिक्षण
अपना जाल बिछायेंगे ।
मार्ग कठिन है
दुर्गम, दुर्लभ
अवरोध भी हैं बड़े-बड़े,
जैसे राह में हों
विशाल, भीमकाय पर्वत खड़े
हवा का रुख भी बदला हो
और धारा भी अनुकूल न हो,
समय समय पर
समय भी माकूल न हो,
माना सिक्के खोटे हैं,
पर नहीं इरादे छोटे हैं
क्या हुआ जो दुर्गम मार्ग है !
क्या हुआ जो रुख भी बदला है !
क्या हुआ जो धारा है प्रतिकूल !
क्या हुआ जो समय भी न अनुकूल !
मजबूती से चलने वाले,
नहीं हैं हम रुकने वाले,
अब एक ही उदघोष् हम करते चले,
आगे बढ़े , आगे बढ़े
बढ़ते चले...
छोटे सपने , बड़े इरादे
हाँ मंजिल पा पाएँगे.....

- अच्युत

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